ख्यालों के बादल आये उमड़ के
कलम मेरी क्यूँ चलने पाती नहीं है

बरसने का आलम तो लगता बहुत है
मगर क्यूँ ये बारिश फिर होती नहीं है

कहना बहुत है, कह पाता नहीं हूँ
है काली घटा पे बरस पाती नहीं है

जुबां जैसे मेरी थम सी गयी हो
कुछ कहने को अश’आर मिलते नहीं हैं

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